राजा मनियार ( 1569-1576 ई . ) अवध
गोरखपुर का ऐतिहासिक वर्णन करते समय इडविन एटकिन्सन ने एक भर प्रमुख मनियार • ( Maniyar ) का उल्लेख किया है . मनियार भी अकबर के शासन काल में अवध क्षेत्र का एक शासक जान पड़ता है , मनियार का किला गोरखपुर के अमोरहा ( Amorha ) में होने का प्रमाण मिलता है . अकबर के शासन काल में उसकी एक स्त्री कछवाहिन भी थी .
अकबर उसे बहुत प्यार करता था . उस कछवाहिन का बचपन का एक यार जगतसिंह था जो कायस्थ जाति से संबंधित था . जब वह कछवाहिन स्त्री ( कछवाहा एक राजपूत जाति है ) अकबर की अंकशायिनी बन गयी तो जगत सिंह भी अकबर के विश्वासपात्रों में से एक हो गया . उसी समय अकबर का एक सेनाधिकारी श्रावस्ती क्षेत्र में भरों द्वार उठाये गये विद्रोह को कुचलने के लिए चल पड़ा . इस सेनाधिकारी का माम फिदय खान ( Fidae khan ) था .
फिदय खान की सेना मगहर की ओर बढ़ रही थी . उस सेना से जगत सिंह भी जा मिला , अमोरहा का शासक मनियार एक ब्राह्मण कन्या से विवाह करने का प्रस्ताव उसके पिता के पास भेजा . उस ब्राह्मण ने मनियार का प्रस्ताव ठुकरा दिया . जब मनियार को विवाह प्रस्ताव की अमान्यता का पता चला तो वह आग बबूला हो गया . मनियार ने कहा कि " हम हिन्दू हैं , प्राचीन हिन्दू , भारत का मूल निवासी . जब ब्राह्मण या क्षत्रिय अपनी कन्याओं को विदेशी मुसलमानों या मुगलों को दे सकते हैं तो हम हिन्दुस्तानी हिन्दुओं को क्यों नहीं दे सकते ? क्या हिन्दुत्व का यही सिद्धान्त है . हमारे पूर्वजों ने विदेशियों की पैठ देश से रोकने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया . हमारा सब कुछ लुट गया . हिन्दुत्व की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने प्राण तक की बाजी लगा दी .
परन्तु आज यही ब्राह्मण या क्षत्रिय मुगलो , पठानों के चरण - चुम्बन में लगे हैं . अपनी कन्याओं को उन्हे देकर राज - पाट के भागीदार हो रहे हैं . इसलिए हम शपथ लेते हैं कि उस ब्राह्मण कन्या को हम अवश्य अपनी रानी बनायेंगे " कर लिया . इस प्रकार संदेश उस ब्राह्मण के यहां पहुंचाया गया . ब्राह्मण ने विवाह का प्रस्ताव भी स्वीकार उसी समय विद्याधर नामक एक ब्राह्मण से कन्या के पिता ने अपनी कहानी सुनाई .
विद्याधर अविलम्ब फिदाय खान तथा जगत सिंह से मिलकर पर शासक मनियार को पराजित करने को जगत सिंह भरों की सामरिक शक्ति से वाफिक था . उसने विद्याधर को समझाया कि किसी च्योहार के दिन ब्राह्मण कन्या का विवाह करवाने का प्रस्ताव मनियार के पास भेज दिय जाय . पर फिदा खान व जगत सिंह की किसी को खबर न दी जाय , ठीक उसी प्रस्तावित दिन को मनिवार ब्राह्मण कन्या को लेने पहुंचा . बड़ी खातिर की गयी बारात की , पर खाने में जहर मिलाकर दिया गया . इस तरह मतियार की फौज बेहोसी हालत में आ गयी . उसी समय फिदाय खान तथा जगत सिंह की सेना मनियार पर टूट पड़ी और उसका कत्ल कर दिया गया .
जगत सिंह को राजदरबार की ओर से पुरस्कृत किया गया और विद्याधर ने उसे जनेऊ पहनाया . जगत सिह अमारहा में अपना निवास स्थान बनवा लिया . गोरखपुर और बस्ती जिलों का वर्णन करते समय इडविन एटकिन्सन इस घटना का वर्णन | अपनी संपादित पुस्तक “ स्टेटिस्टिकल डिस्कृप्टिव एन्ड हिस्टारिकल एकाउन्ट आफ दी वाणन वेस्टर्न प्राविन्सेस आफ इन्डिया ” के वाल्यूम 6 , पृष्ठ 442-43-44 ( 1881 ) फर इस प्रकार देते हैं । • It has already been mentioned that the Bhars were at this time expelled from Amorha by the Kacchwahas or their dependents . The first Raja of Amorha was however not a Kacchwaha , but a kayasth fevorite of Akbor's kacchwahin vihe , Jagat singh appears to have accompanied Fidae khan's army to Maghar . There has aid was invoked by the Brahmin Bidyadhar , who wished to prevent a forced marriage between the Bhar Chief Maniar and a Brahman's daughter , After treach erously gaining the confidence of Bhars , Jagat intoxicated and slew him during a festival , with the aid of Bidyadhar . For this meritorious act his family is said to have received the sacred thread . They at all events , under colour of the real or pre tended great to their mistress , established themselves in Amorha . ' उदयपुर परिवार का एक राजपूत और सिसोदिया गहलोत वंश का एक राजपूत भी की सेना के अंग थे जो फिदा खान के साथ मनियार को पराजित करने के लिए उसके “ कटहला राज " में आये थे . स्मरण रहे कि मनियार का राज उस समय कटहला राज कहलाता था . एटकिन्सन के शब्दों में - अकबर * A Rajput connected with the Udaipur family , and therefore a Sisodia Gahlot , was with Jagdeo at the time of the murder , assisting in both the subsequent struggle with the Bhars . In consideration of his service he received the eastern portion of the conqured tract and established himself at Nagar . The Ousted Bhars took refuge in the extreme north of the district , where they are said to have founded the Katahla Raj . " ' उदयपुर परिवार के राजपूत तथा सिसोदिया गहलोत राजपूत दोनों को , विजित किये गये कटहला राज का पूर्वी भाग दे दिया गया . वे नगर में अपना निवास स्थान बना लिए . भर लोग शरणार्थी की तरह कटहला राज में रहने लगे . कहा जाता है कि उस समय जितने भी नौजवान भर थे उनका बेरहमी से कत्ल किया गया . ईश्वरी प्रसाद ने मनियार तथा फिदाय खां का युद्धकाल 1576 ई . निरुपित किया है . 1564 में अकबर गोंड़ वंश की गोंडवाना महारानी दुर्गावती को पराजित कर चुका था . मालवा का शासक बाझ बहादुर भी अकबर के सेनाधिकारी आदम खान द्वारा मार डाला गया था . अमेर शासक भारमल अपनी कन्या अकबर को देकर अपने दोनों पत्रों भगवानदास तथा मान सि । सेना के ऊंचे पदों पर आसीन करवा चुका था ( 1562 ई . ) , मेवाड़ का सिसोदिया राणा ( उदयसिंह ) पहाड़ों में छिप गया . रणथम्भौर , चित्तौड तथा कलन्जर के किलों पर अलवर का कब्जा हो चुका था . उदयसिंह 1572 ई . में परलोकवास कर चुके थे . लेकिन उनका पुत्र राणा प्रताप मेवाड़ की रक्षा के लिए उठ खड़ा हुआ . उसने अपने सैनिकों को मातृभूमि की रक्षा के लिए कुर्वानी देने को कहा . राणा प्रताप की यही हुंकार भर शासक मनियार पर असर कर गयी . राज व ब्राह्मणों की गद्दारी को उसने “ कटहला राज ” से चुनौती दी . एक ओर हल्दीबाटी और दूसरी टाल कटहला राज का मैदान . दोनों जगहों से अकबर को गंभीर चुनौती मिली . हिन्दुत्व की रक्षा का भार बहन करने वाले बहुत से राजपूत और ब्राह्मण अकबर के कदमों तले हिन्दुत्व को रख दिया . पर राणा प्रताप और मनिवार ने हिन्दुत्व की पगड़ी बचाई पर सिर कटाने में वे पीछे नहीं है व्ही से अकबर के चापलूसों ने एक मुहावरा निकाला “ सर सलामत तो पगाड़ी हजार ” मनिवार ने कहा - सर जाय पर पगड़ी न जाय , ” उब पगड़ी ( मान - मयांदा ) ही चली बाब तो कत्रय का जीना धिक्कार है . राणा प्रताप की संतति तथा मनिवार की संतति दोनों आज की शासन व्यवस्था में पिछड़ी जाति में आती हैं . अगड़े लोगों ने जो इतिहास कायम किया क्या वह गर्व का विषय है ? कदापि नहीं . स्टकिन्सन ने पृष्ठ 429-30-31 व्या 32 पर उस सिद्धान्त की पूर्णतया पुष्टि की है जिसमें मरों को नागवंशी सिद्ध किया गया है . पाली भाषा का हवंक - कुल ' ही भर वंश है जिसके प्रधान सासकों में मगध के बिम्बिसार , अजातशत्रु एवं काशी के शिशुनाग आते हैं . अवध नरेश प्रसेनजित की बहन कोसलादेवी से बिम्बिसार का विवाह हुआ था . इस प्रकार सनैः सनै कोसल पर मरों का सिंकजा कसता गया . चौथी से तीसरी शताब्दी ईशा पूर्व कोसल पुनः भों के कब्जे में आ गया प्रसेनजित बौद्ध धर्म से प्रभावित था . उसका पुत्र विदूड़क शाक्य कहलाया जाने लगा . उसे मुद्रकात् कुलको भाव्य कुलकात सुरथः स्मृतं ; सुमित सुरथस्यापि अंत्यश्च भविता नृप ; अवध का सम्पूर्ण प्रदेश भरों और वारुओं ने सूर्यवंशियों से अपने अधिकार में ले लिया . बृचानन ने इसे सिद्ध करके इसकी समय सीमा 500-4508.C . बताई है . पर अन्य इतिहासकारों ने कुछ समय सीमा 57 ईशा पूर्व निरुपित किया है . एक अनुश्रुति के अनुसार 512 ई . पू . में एक सूर्यवंशी राजा अयोध्या से गोरखपुर या बस्ती आया . उसने इस क्षेत्र में एक हजार मंदिर बनवाने का प्रण किया था . जब १११ मंदिर बन चुके थे उसी समव भर सरदार ने उस सूर्यवंशी राजा का वध कर दिया और सम्पूर्ण प्रदेश को अपने अधिकार में ले लिया . उसने रुद्रपुर में एक विशाल किले का निर्माण करवाया . एटकिन्सन इसे इस प्रकार कहते हैं . has been mentioned that the Surajbansi founder of buldings in the same tract med fled eastwards before the Bhars from Ayodhya . This quite agrees with the and of the Bhars themselves that they came from the wast . The date of their conquest.may here be fixed at between500 and 450B.C.and are probably passedभाग है . भर सरदार कौकबिल के विषय में अन्य जानकारी इतिहासों में नहीं मिलती है . गोरखपुर के कमिशनर ने लिखा है कि श्रानेत्र क्षत्रियों ने भर , डोम तथा अन्य आदिम जातियों से यहां का राज्य छीन लिया था . ( देखें . - Commisners of Gorakhpur Revenue Records , Vol 74 , Fle No. 91 , Serial No. 58 , Page 116 ) . स्विन्टन एलन के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में ध्रुवचन्द नामक कौशिक क्षत्रिय ने घाघरा नदी के उत्तर में , शिवपुर नामक स्थान पर परों से भयंकर युद्ध किया था . इस युद्ध में भरों ने अपार साहस का परिचय दिया था . उस समय दिल्ली का सुल्तान मुहम्मद तुगलक ( 1325-51 ई . ) अवध क्षेत्र का गवर्नर ऐनुल मुल्क ( Ainul Mulk ) को नियुक्त किया था . मुहम्मद तुगलक के दिल्ली से दौलताबाद राजाधानी घोषित करने पर उत्तर के हिन्दू राजा स्वतन्त्र होने के लिए आकुल थे . ऐनुल मुल्क ने उसी समय भरों को स्वतन्त्र होते देख उस क्षेत्र के सवर्ण क्षत्रियों को साथ लेकर भरों पर धावा बोल दिया . ध्रुवचन्द ऐनुल मुल्क के विश्वास पात्रों में से एक था . ध्रुवचन्द का जिस समय घाघरा नदी के किनारे युद्ध चल ही रहा था और उस युद्ध में भर सरदार की निश्चित विजय दिख रही थी , उसी समय ऐनुल मुल्क एक सेना टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया . ध्रुवचन्द और ऐनुल मुल्क दोनों में मिलकर भरों से घनघोर युद्ध किया . कहते हैं कि घाघरा नदी से भरों की सेना एक ओर घिर गयी और दूसरी ओर ध्रुवचन्द तथा ऐनुल मुल्क की सेना ने वार पर वार करना प्रारंभ कर दिया . इस प्रकार भर उस क्षेत्र से अपना राज्य हार गये . ( देखें - Swinton Allen - Manual of the statistical of the district of Gorakhpur , page . 18 ) एच . एल . बीन्स ( HL Baines ) के अनुसार बस्ती जिले के नगर क्षेत्र से भरों को पराजित कर जगदेव सिंह नामक गौतम क्षत्रिय ने अपना राज्य स्थापित किया ( देखें - Settlement Report of the District of Gorakhpur , ( 1868 ) , Page 140 ) उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 93 का नगर पूर्व 167 वां चुनाव क्षेत्र है जो कि सुरक्षित है . सपा के रामकरन आर्य भाजपा के वेद प्रकाश गुप्त को हरा कर ( 16126 मतों से ) यहाँ चुनाव जीता था . टिस्ट्रिक्ट गजेटियर बस्ती , पृष्ठ 92 पर एच . एल . बीन्स तथा एटकिन्सन लिखते हैं कि परगना अमोड़ा में कान्हदेव नामक सूर्यवंशी क्षत्रिय ने राय जगत सिंह कायस्थ के साथ मिलकर भरों को पराजित किया था . अंग्रेज अधिकारियों तथा इतिहासकारों को राजा मनियार के शासनकाल के अनेक ऐतिहासिक अमाण उपलब्ध जगह जगह पर हुए थे , पर इस विषय में क्रमबद्ध लिखा नहीं गया है . गोरखपुर , बस्ती , देवारिया तथा गाजीपुर जिलों के अनेक गांवों , कस्बों एवं बाजारों के नामकरण मनियार ने करवाये थे . कौड़ीराम , मानीराम , पिपरइचा , सहजनवा , मेहदावल , हरैया , हाटा , बैरंगिया , पडरौना , कसमा , सेवरही तथा बासगांव आज भी राजा मनियार के इतिहास को आत्मसात किये हुए हैं . बलिया का बांसडीह , चिलकहर तथा रसड़ा भरों के इतिहास को आज भी जीवित रखे हुए है . पर स्थानीय लोगों को इसकी वास्तविकता का पता नहीं हैं .

Comments
Post a Comment