भारशिव भर वीरों की वीर गाथा

 


ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर कुछ लोगों का विचार इस प्रकार है कि जिस समय शक, हुण, यवन आदि विदेशी जातियों का आक्रमण उत्तर भारत में होना शुरू हुआ। तो इन वीर भरत भर क्षत्रिय जातियो ने  उन मलक्ष्यों को देश की सीमा से बाहर निकाल देने का भार अपने सर पर लिया। उन्हें सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर संसार के समक्ष अपनी वीरता का पूर्ण परिचय दिया। अतः इसी भार को ग्रहण करने के कारण यह राज वंशीय वीर राजभर भरत कहलाए जाने लगे। जो इस नाम से अब तक प्रसिद्ध हैं चाहे जो कुछ भी हो परंतु यह निर्विवाद सिद्ध है कि अवश्य मेव भर शब्द भार शब्द का  अपभ्रंश है और इन्हीं बातों के आधार पर इस जाति का प्रादुर्भाव भी हुआ है .


आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व उत्तरी भारत वर्ष में विशाल शासन करते थे। भर वंश के राजा बड़े प्रतापी शुरवीर ऐश्वर्य शाली और योद्धा हुए हैं जिन्होंने अपने बाहुबल और पराक्रम से देश पर आक्रमण करने वाली शक, कुषाण, यवन आदि विदेशी जातियों को मार भगाने में सक्षम हुए हैं। यह लोग वर्तमान मथुरा इलाहाबाद, अवध, मिर्जापुर, काशी वगैरह में रियासतें स्थापित कर सदियों राज्य करते रहे हैं। क्योंकि यह लोग पहले शैव संप्रदाय के अनुवायी थे शिव जीके परम उपासक होने के कारण ये लोग प्रारंभ में भारशिव नाम से विख्यात हुए। तत्पश्चात यही राजभर और भर जाति के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस भारतवर्ष में किसी भी जाति का अश्वमेध यज्ञ करने का जिक्र अगर किसी का होता है तो वह राजभर जाति का,

बनारस में राजभरो ने अश्वमेघ यज्ञ करके पूरे भारत को चैलेंज कर दिया, कि अभी भरो का भरताज जिंदा है। तमाम इतिहासकारो का मानना है कि भर लोग जाति के ब्राह्मण हैं और कर्म के क्षत्रिय है


 इस जाति के संबंध में एकमात्र प्रसिद्ध सरस्वती नामक हिंदी मासिक पत्रिका के सुयोग्य संपादक श्रद्धेय श्री पंडित देवीशंकर शुक्ल जीने ग्राम संदेश में लिखित उल्लेख प्रकाशित किया है कि भर या भार उन  भारशिव क्षत्रियों के वंशधर हैं जिन्होंने विंध्य क्षेत्र कांति पुरी में अपनी राजधानी स्थापित करके भारत से शकों को मार भगाने का महान उपक्रम किया था। बाद में इनका प्रभाव हो जाने पर कालांतर में इनके नाम का शिव शब्द हट गया होगा। और वह भार  कहलाने लग गए होंगे। भर क्षत्रियो ने आगे आकर मुसलमान आक्रमणकारियों से डटकर लोहा लिया। और  यह स्वतंत्रता का युद्ध लगातार 200 वर्षों तक होता रहा .अंत में रायबरेली जिले के सुदामन पुर के युद्ध में भरो के अंतिम भर सरदारो को जौनपुर के इब्राहिम शाह शर्की  ने धोखे से आक्रमण कर भरो का नाम शेष कर दिया, सुदामनपुर के युद्ध के संबंध में मुसलमान  इतिहास कारो ने लिखा है कि इसी युद्ध में इस्लाम के तलवार की प्यास बुझ गई थी।

 ऐतिहासिक ग्रंथों के पढ़ने से प्रकट होता है कि कन्नौज राज के अधिकांश भूभाग के भर लोग स्वामी बन बैठे थे, कलिंजर, बहराइच, सुल्तानपुर, इलाहाबाद,और रायबरेली उनकी शक्ति के प्रधान केंद्र थे। सुल्तान अल्तमस के पुत्र अलाउद्दीन ने बहराइच के भरो  का पराभव करने में  डेढ़ लाख सैनिकों से हाथ धोया याद रखने वाली चीज यह है कि महाराजा सुहेलदेव भर वीर शिरोमणि के युद्ध में भी डेढ़ लाख के आसपास मुस्लिम सैनिक मारे गए थे बलबन ने कलिंजर के भरो का पराभाव किया।


 अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तानपुर के भर क्षत्रियो की शक्ति तोड़ दी, रायबरेली के भरो की शक्ति इब्राहिम शर्की जौनपुर द्वारा खत्म कर दी गई , भर क्षत्रियो के इस पराभव गाथा सबसे दुख का प्रकरण यह है कि जिस समय भर क्षत्रिय लोग मुसलमान आक्रमणकारियों से अपने देश की रक्षा के लिए, यानी देश की स्वतंत्रता के लिए तलवार की झंकार कर रहे थे। ठीक उसी समय भर क्षत्रियो के (अन्य प्रांतों से) अपने ही लोग दलों के पीछे से आक्रमण कर दिया करते थे, इस प्रकार से यह लोग दो तरफ से युद्ध में घिर गए थे। तथापि इनके लिए यह कम गौरव की बात नहीं है कि उन्होंने जो लगातार 200 वर्षों तक अपनी   स्वतंत्रता और राष्ट्र धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए बड़े धैर्य और साहस के साथ आक्रमणकारियों का सामना किया करते थे। और अपने आप को न्योछावर कर दिया केवल उनका नाम शेष रह गया .

तथा गुलामी का जीवन व्यतीत करने को नहीं रह गए। इस भूमि में कन्नौज राज के इन वीर भरो की पराक्रम वीर गाथा यद्यपि श्रृंखलाबद्ध रूप से उपलब्ध है। तथापि उनके संबंध में जो प्राचीन सामग्री मिलती है वह उनका नाम अमिट बनाए रखेगी, इतिहास में इस विषय में जो दत्त कथाए प्रचलित हैं। और उनके नगरों के ध्वंसावशेष (खंडहर) पाए जाते हैं उनसे प्रकट होता है कि भर लोग बड़े बड़े दुर्गों में रहते थे तथा चंद्रिका देवी के उपासक थे।


 उनके चंद्रिका देवी के मंदिर आज भी उत्तर प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों में पाए जाते हैं गोंडा बहराइच फैजाबाद रायबरेली सुल्तानपुर जौनपुर प्रतापगढ़ बनारस मिर्जापुर कानपुर इलाहाबाद आजमगढ़ और वादा आदि जिलों में पाए जाते हैं। कन्नौज राज्य के इन वीरों का इतिहास आजकल इन दिनो मे निहित पड़ा है.


और यहां तक की अंगिनत  डीह पाए जाते हैं दुख की बात है कि इस देश के विद्वान इतिहासकार इस वीर क्षत्रिय जाति के संबंध में किसी प्रकार से खोज नहीं करना चाहते हैं। यहां तक की ध्यान नहीं देना चाहते। परंतु यह निर्विवाद है कि उनके इतिहास की अमर कहानी मिट नहीं सकती। और न उनके समय के ताम्रपत्र के उल्लेख के बिना भारत का इतिहास पूर्ण हो सकेगा। क्षत्रिय भर वीरों के वंशज कहां है, अपने इतिहास को भूल गए राजभरो। क्या अपने पूर्वजों को याद करते हो, धन्य हो कि आप एक वीर क्षत्रिय कौम के वंशज हो,

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