ऐसा भारशिव सम्राट जिसने विदेशी मुगलों की दासता स्वीकार नहीं की। उन्होंने देश, धर्म और स्वाधीनता के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।
उस महान योद्धा का नाम राजा चंदल राजभर भारशिव है।
भारत के इतिहास में भर भारशिव क्षत्रिय का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। यहां के भर रणबांकुरों ने देश, जाति, धर्म तथा स्वाधीनता की रक्षा के लिए भर क्षत्रिय ने अपने प्राणों का बलिदान देने में कभी संकोच नहीं किया। उनके इस त्याग पर संपूर्ण भारत को गर्व होना चाहिए। वीरों की इस भूमि में भरत भर भारशिव के छोटे-बड़े अनेक राज्य रहे ।जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया।
इन्हीं राज्यों में अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव राजा चंदल राजभर महाराजा वीरसेन भारशिव, महाराजा बिजली भर, बारादेव राजभर, असीलदेव भर, महाराजा सुदास भारशिव, केरार वीर, हरदेव भर, जग्गू जगदेव राजभर राजा नहुष, राजा इन्दु भर,महिपाल राजभर, इत्यादि वीर शिरोमणि महाराजा सुहेलदेव राजभर ने जन्म लिया है।
सवाल यह उठता है कि महानता की परिभाषा क्या है। विदेशी हमलावरों ने लाखों लोगों की हत्या करके महान कहलाते है ।और लोगों की जान बचाकर भी महान नहीं कहलाते हैं। दरअसल, हमारे देश का चाटुकार इतिहासकार, वामपंथी और कम्युनिस्टों ने लिखा है।
उन्होंने उन-उन लोगों को महान बनाया जिन्होंने भारत पर अत्याचार किया। या जिन्होंने भारत पर आक्रमण करके उसे लूटा, भारत का धर्मांतरण किया और उसका मान-मर्दन कर भारतीय गौरव को नष्ट किया। तथा मुगलों और विदेशी हमलावरों का साथ दिया..
भर राजा चंदल भारशिव, ग्राम अशनी, परगना, तहसील, जिला फतेपुर अशनी ग्राम २६,३'उत्तरी अक्षांश और ८०,५७'दक्षणी देशान्तर के मध्य जिला मुख्यालय फतेपुर से १९ किलोमीटर की, दूरी पर पूर्वोत्तर दिशा में फतेपुर से लालगंज रोड से दाहिने गंगा नदी के तट पर स्थित है।११ वीं सदी में यहां पर भर राजा चंदल राजभर का एक किला था।
इनके राज्य का विस्तार उत्तर में गंगा नदी, दक्षिण में टिकर, पश्चिम में परशुरामपुर और पूरब में हथगाव तक विस्तृत था।११ वीं सदी में एक विशाल सेना के साथ । महमूद गजनवी गजनी देश से भारत विजय पर निकला। उस उत्तर भारत के तमाम राजाओं को परास्त किया। और कायर राजाओं को अपने साथ मिलाया। लालच देकर,और फिर अपना एक विशाल सेना का निर्माण किया। तमाम राज्य में लूट पाट मचाया। यहां से अथात संपत्ति लूट कर अपने देश ले गया ।उन्हें अधीनता और इस्लाम स्वीकार करने पर जान बकसते हुए फतेपुर जनपद में आकर अपना पड़ाव डाला।
अपने कैंप से भर राजा चंदल राजभर को पत्र भेजा कि तुम अधीनता स्वीकार करलो ।इस्लाम कबूल कर लो अन्यथा मै तुम्हें और तुम्हारे राज्य को तहस नहस कर दूंगा। महमूद की अधीनता स्वीकार की बात सुनकर भर राजा चंदल राजभर आग बबूला हो गए। तुरन्त मंत्री और सेनापति को महल में बुलवाए और सारी स्थिति से अवगत कराया। और कहा कि इस्लाम कबूल करने की बात तो दूर है, हम अपने धर्म और अपने कौम पर दाग नहीं लगने देंगे। हम उस कूल से हैं जिसने कभी झुकना नहीं शिखा
भर जाति ने कभी भी अधीनता स्वीकार नहीं किया। भर जाति का खून ही ऐसा है कि इस ने सत्ता के लिए सर कटा दिया है परन्तु कभी सर नही झुकाया। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिएं कभी भी भर जाति के लोगों ने अपने दुश्मनों से अपनेधर्म, बहन और बेटियों का समझौता नहीं किया है। जब हमारा धन, धर्म, सम्मान और स्वाभिमान ही नहीं बचेगा तो सत्ता के लिए इस्लाम स्वीकार कर के अपनी जाति और धर्म को कतई कलंकित नहीं करेंगे।
अत आप लोग तत्काल युद्ध की तैयारी करें। भर सैनिक अपने देश धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उतावले हो गए, हर हर महादेव के नारो से अकाश गुज उठा।
युद्ध भूमि में दोनों सेनाएं आमने सामने हो गई, लड़ाई का बिगुल बजते ही दोनों सेनाएं आपस में जूझ गई। भीषण संग्राम हुआ। दोनों तरफ से तमाम सैनिक मारे जाने लगे। अतः महमूद के विशाल सेना के सामने भर राजा के अल्प सैनिक कब तक टिकते।
राजा चंदल भर कि सेना भूखे शेर की भांति टूट पड़े थे । महमूद गजनवी की सेना को गाजर मूली की तरह रौद दिए थे । महमूद गजनबी डर गया था । कहीं हम हार न जाए
उसने एक चाल चली.... शाम होने लगी थी वह कल लड़ाई लड़ने का प्रस्ताव रखायह लड़ाई कल लड़ी जाएगी,
लड़ाई जैसे शांत हुई धोखे से भर राजा चंदल को पीछे से वार कर दिया। और फिर एक-एक करके सारे सैनीक मारे गए।
युद्ध भूमि में शहीद सैनिकों की लाशों से युद्ध भूमि पट गया।(सन्दर्भ ग्रन्थ जिला गजेटियर फतेपुर (१९८०)पेज पर अंकित है लेखक डॉ परमानंद मिश्रा के अनुसार राजा चंदल भर शासक थे।भर चंदल राजा ने अपने जीवन काल में बहुत सी लड़ाई लड़ी थी । भर राजाओं की वीरता का परिचय कराना बड़ा ही मुश्किल कार्य है हर क्षेत्र में इन्होंने डंका बजाया है


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