डलमऊ दुर्ग का राजभरो का अनकहा इतिहास-🤺🤺




उत्तरप्रदेश के रायबरेली जनपद में गंगा नदी के किनारे स्थित है प्रसिद्ध डलमऊ का दुर्ग । रायबरेली लखनऊ से मात्र 78 km दूरी पर बसा है।

इस दुर्ग का निर्माण भर क्षत्रिय राजा डलदेव भर ने कराया था, अपने शासन के दौरान। 
राजा डाल देव भर चार भाई थे। डल देव राजभर और बल देव भर काकोरन, काकोरन भर ने काकोरी कस्बा बसाया था,
बलदेव भर अक्सर भोग विलास में लीन रहते थे,और भाला चलाने के बड़े शौकीन थे।


फाल्गुन के महीने में बलदेव भर ने होली के दिन तलवार की पूजा करते थे। और उस दिन तलवार नहीं उठाते थे , त्यौहार का भरपूर आनंद लेते थे। उसी का फायदा उठाया इब्राहिम साह शर्की ने,
जौनपुर का इब्राहिम शाह शर्की ने डालमऊ दुर्ग पर अचानक आक्रमण कर दिया , परंतु जबतक राजा डल देव व बल देव भर संभल पाते मुस्लिम सेना ने  दोनों भाइयों का रात में पीछे से किसी ने वार कर दिया।

इस युद्ध मे राजा डलदेव भर और बल देव की रानियों के साथ साथ सैंकड़ो क्षत्राणियों ने अपने माँग के सिंदूर खोये।
भर क्षत्राणियों ने भी बाकी कुल के क्षत्राणियों की भांति सैंकड़ो बार अपने क्षत्रिय मान मर्यादा की रक्षा के लिए जौहर किया। 


दोनों भाइयों की रानियों भर क्षत्राणियों ने आक्रमण के प्रत्युत्तर में जंग का बिगुल बजा दिया और रणचण्डी का रूप ले शमशीर हाथ में उठा दुराचारीयो को रात के समय तमाम दुश्मनों के सैनिक के शरीर धड़ से अलग कर देती थी। भर क्षत्राणियों ने लड़ते लड़ते पूरी तरह से थक चुकी थी, तो जौहर स्वीकार किया। लेकिन पापियों के हाथ नहीं लगी। और भर क्षत्रिय की यही पहचान थी
पापियों के सैनिकों को मारकर अपने पतियों की मौत का बदला ले अपने भर क्षत्राणी होने का उदाहरण पेश किया।

इसके बाद सैंकड़ो की तादाद में भर क्षत्राणियों ने डलमऊ दुर्ग में जौहर किया।

उस जौहर की याद में आज भी डलमउ क्षेत्र में लोग फाल्गुन में होली का उत्सव नहीं मनाते हैं।

कोशिश मत करना इन्हें तोड़ने की
भस्म हो गए तोड़ने वाले,

भारशिव क्षत्राणी हैं ये
मर्यादा और गुरूर का चुनर ओढ़ कर चलती थी

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